Tuesday, October 26, 2010

दो रचनाएं : सन्दर्भ - करवा चौथ


जयकृष्ण राय तुषार 
उज्जैन के महाकालेश्वर मंदिर के सम्मुख
एक
आज करवा चौथ का दिन है

आज करवा चौथ
का दिन है
आज हम तुमको संवारेंगे।
देख लेना
तुम गगन का चांद
मगर हम तुमको निहारेंगे।

पहनकर
कांजीवरम का सिल्क
हाथ में मेंहदी रचा लेना,
अप्सराओं की
तरह ये रूप
आज फुरसत में सजा लेना,
धूल में
लिपटे हुए ये पांव
आज नदियों में पखारेंगे।

हम तुम्हारा
साथ देंगे उम्रभर
हमें भी मझधार में मत छोड़ना,
आज चलनी में
कनखियों देखना
और फिर ये व्रत अनोखा तोड़ना ,
है भले
पूजा तुम्हारी ये
आरती हम भी उतारेंगे।

ये सुहागिन
औरतों का व्रत
निर्जला, पति की उमर की कामना
थाल पूजा की
सजा कर कर रहीं
पार्वती शिव की सघन आराधना,
आज इनके
पुण्य के फल से
हम मृत्यु से भी नहीं हारेंगे।

दो 
जमीं के चांद को जब चांद का दीदार होता है

कभी सूरत कभी सीरत से हमको प्यार होता है
इबादत में मोहब्बत का ही इक विस्तार होता है

तुम्हीं को देखने से चांद करवा चौथ होता है
तुम्हारी इक झलक से ईद का त्यौहार होता है

हम करवा चौथ के व्रत को मुकम्मल मान लेते हैं
जमीं के चांद को जब चांद का दीदार होता है

निराजल रह के जब पति की उमर की ये दुआ मांगें
सुहागन औरतों का स्वप्न तब साकार होता है

यही वो चांद है बच्चे जिसे मामा कहा करते
हकीकत में मगर रिश्तों का भी आधार होता है

शहर के लोग उठते हैं अलार्मों की आवाजों पर
हमारे गांव में हर रोज ही जतसार होता है

हमारे गांव में कामों से कब फुरसत हमें मिलती
कभी हालीडे शहरों में कभी इतवार होता है।
चित्र -गूगल से साभार 

चित्र  ganeshaspeaks.com 

Sunday, October 10, 2010

प्रोफेसर वशिष्ठ अनूप की दो गजलें


कवि/ लेखक प्रोफेसर वशिष्ठ अनूप
प्रोफेसर हिन्दी विभाग, काशी हिन्दू विश्वविद्यालय, वाराणसी
ईमेल : vanoopbhu09@gmail.com
मोबाइल : 09415895812

प्रोफेसर वशिष्ठ अनूप हिन्दी कविता के महत्वपूर्ण हस्ताक्षर हैं। स्वभाव से विनम्र और मिलनसार इस महान कवि/ लेखक का जन्म 1 जनवरी 1962 को उत्तर प्रदेश के महत्वपूर्ण जनपद गोरखपुर के सहडौली (दुबेपुरा गांव) में हुआ। पी०एच०डी० और डी०लिट्‌ उपाधियों से सम्मानित इस कवि/ लेखक की अब तक प्रकाशित पुस्तकें हैं - बन्जारे नयन (2000), रोशनी खतरे में है (2006), रौशनी की कोपलें (2010), गजल-संग्रह। हिन्दी की जनवादी कविता, जगदीश गुप्त का काव्य-संसार, हिन्दी गजल का स्वरूप और महत्वपूर्ण हस्ताक्षर, हिन्दी गजल की प्रवृत्तियां, हिन्दी गीत का विकास और प्रमुख गीतकार, हिन्दी साहित्य का अभिनव इतिहास, हिन्दी भाषा, साहित्य एवं पत्रकारिता का इतिहास, 'अंधेरे में' : पुनर्मूल्यांकन, 'असाध्यवीणा' की साधना साहित 28 पुस्तकों का लेखन व सम्पादन। विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में गीत, गजल, कविता, कहानी और समीक्षाएं प्रकाशित। प्रो० वशिष्ठ अनूप की दो गजलें हम अपने पाठकों के साथ साझा कर रहे हैं -



(1)
जिक्र आया तुम्हारा तो अच्छा लगा

गांव-घर का नजारा तो अच्छा लगा,
सबको जी भर निहारा तो अच्छा लगा।

गर्म रोटी के ऊपर नमक-तेल था
माँ ने हँसकर दुलारा तो अच्छा लगा।

अजनबी शहर में नाम लेकर मेरा
जब किसी ने पुकारा तो अच्छा लगा।

एक लड़की ने बिखरी हुई जुल्फ को
उँगलियों से संवारा तो अच्छा लगा।

हर समय जीतने का चढ ा था नशा
अपने बेटे से हारा तो अच्छा लगा।

रेत पर पाँव जलते रहे देर तक
जब नदी ने पखारा तो अच्छा लगा।

एक खिड की खुली, एक परदा उठा
झिलमिलाया सितारा तो अच्छा लगा।

दो हृदय थे, उफनता हुआ सिन्धु था
बह चली नेह-धारा तो अच्छा लगा।

चाँद-तारों की, फूलों की चर्चा चली
जिक्र आया तुम्हारा तो अच्छा लगा।



(2)
तेरे पास ही कृष्ण की बांसुरी है

हँसी फूल-सी और बदन मरमरी है
किसी जादूगर की तू जादूगरी है

है लगता कभी सिन्धु-मंथन से निकली
है लगता कभी स्वर्ग की तू परी है।

बताती है मुस्कान तेरे लबों की
तेरे पास ही कृष्ण की बांसुरी है।

तुम्हारे बिना मानती ही नहीं यह
करे क्या कोई प्रीति ही बावरी है।

ये बंजारापन जाने कब तक चलेगा
मेरे साथ ये कैसी आवारगी है।

न जाने कभी फिर मिलें ना मिले हम
न शरमाइये यह विदा की घड़ी है।

दुआ कीजिए इसको मिल जाये मंजिल
समंदर की लहरों पे नन्हीं तरी है।




चित्र bipinsoni.com से साभार